एक राष्ट्र — एक चुनाव से क्या मा० प्रधानमंत्री मोदी जी अपने पैर मे कुल्हाडी मारने जा रहें है।

 एक राष्ट्र — एक चुनाव से क्या मा० प्रधानमंत्री मोदी जी अपने पैर मे कुल्हाडी मारने जा रहें है।



दोस्तों एक राष्ट्र — एक चुनाव से क्या मा० प्रधानमंत्री मोदी जी अपने पैर मे कुल्हाडी मारने जा रहें है। क्या अपने पद से इस्तीफा देगें। क्या देश में सभी राज्यों की चुनी हुई सरकारें गिर जायेंगी। क्या होगा जब देश मे एक राष्ट्र—एक चुनाव लागू हो और बीच मे ही केन्द्र सरकार अल्पमत मे आकर गिर जाये । क्या होगा जब जब देश मे एक राष्ट्र—एक चुनाव लागू हो और बीच मे ही राज्य सरकार अल्पमत मे आकर गिर जाये‚ तब क्या राष्ट्रपति शासन लागू होगा या फिर कुछ और होगा।

एक राष्ट्र, एक चुनाव: क्या है इसका महत्व और चुनौतियाँ? 

दोस्तो भारत जैसे विशाल देश और 28 राज्य तथा 8 केन्द्र शासित प्रदेश में एक साथ चुनाव कराना सम्भव हैं‚ क्योकि आप देख रहें है कि मणिपुर और जम्मू और कश्मीर के हालात ठीक नही हैं वहीं नक्सल प्रभावित क्षेत्र भी काफी समस्या उत्पन्न करतें है। लेकिन फिर भी केंद्र सरकार ने "एक राष्ट्र, एक चुनाव" (One Nation, One Election) के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिससे देशभर में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का रास्ता खुलता नजर आ रहा है। यह मुद्दा काफी समय से चर्चा में था, और अब इसे कानूनी रूप से लागू करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। आइए, इस प्रस्ताव को विस्तार से समझते हैं और इसके फायदों व चुनौतियों पर नजर डालते हैं।

क्या है एक राष्ट्र, एक चुनाव का मतलब?

"एक राष्ट्र, एक चुनाव" का तात्पर्य यह है कि देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक ही समय पर कराए जाएं। इससे 5 साल में एक बार ही चुनाव होंगे, जिसमें न केवल लोकसभा बल्कि सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी साथ-साथ होंगे। इसके अलावा, नगरपालिकाओं और पंचायतों के चुनाव भी इन्हीं के साथ कराए जाने का सुझाव दिया गया है, जिससे बार-बार चुनाव कराने की जरूरत न पड़े।

फायदे क्या होंगे? क्या इसका लाभ देश की GDP ग्रोथ को मिलेगाॽ

  1. खर्च में कटौती:
    बार-बार चुनाव कराने से चुनाव आयोग, प्रशासन, राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों पर भारी खर्च आता है। अगर एक साथ चुनाव होंगे, तो यह खर्च काफी कम हो सकता है। इससे करोड़ों रुपये की बचत होगी, जो विकास कार्यों में लगाए जा सकते हैं।

  2. प्रशासन और विकास पर फोकस:
    बार-बार चुनाव होने से प्रशासन का ध्यान चुनावी तैयारियों में ही लगा रहता है, जिससे विकास कार्यों पर असर पड़ता है। एक साथ चुनाव होने से प्रशासन को 5 साल का स्पष्ट समय मिलेगा, जिसमें वो बिना किसी बाधा के विकास कार्यों पर ध्यान दे सकेगा।

  3. काले धन पर लगाम:
    चुनावी प्रक्रिया में अक्सर काले धन का इस्तेमाल होता है। एक साथ चुनाव होने से बार-बार धन के दुरुपयोग की संभावना कम हो जाएगी और राजनीतिक स्थिरता बनी रहेगी।

  4. राजनीतिक स्थिरता:
    अक्सर राज्य सरकारें अपने कार्यकाल से पहले ही गिर जाती हैं, जिससे बार-बार चुनाव कराने की नौबत आती है। एक साथ चुनाव से राजनीतिक स्थिरता बनी रहेगी और त्रिशंकु सरकारों की स्थिति से बचा जा सकेगा।

चुनौतियाँ और इन चुनौतियों का निपटान कैसे होगा।

  1. संवैधानिक बदलाव:
    दोस्तों एक राष्ट्र, एक चुनाव लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा, क्योंकि वर्तमान संविधान के अनुसार, राज्य विधानसभाओं को अपने कार्यकाल के दौरान भंग करने का अधिकार होता है। इस बदलाव के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जो अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।

  2. विपक्ष का विरोध:
    दोस्तों इस बदलाव का राजनीतिक दल विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह संविधान की मूल संरचना के खिलाफ है। कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने इसे लोकतंत्र-विरोधी बताया है। उनका मानना है कि यह राज्य विधानसभाओं के अधिकारों पर अंकुश लगाएगा।

  3. लॉजिस्टिक चुनौतियाँ:
    एक साथ चुनाव कराना एक बड़ा प्रशासनिक और लॉजिस्टिक चुनौती होगी। इसमें लाखों ईवीएम, चुनावी अधिकारी, और सुरक्षा बलों की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, चुनावी प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को भी दुरुस्त करना होगा क्योंकि इतने बडे देश में कहीं ना कहीं उपद्रव व अशांति फैली रहती है जैसे मणपिुर में इस समय चुनाव कैसे सम्भव है।

  4. हंग असेंबली (त्रिशंकु विधानसभा) की स्थिति:
    अगर किसी राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बनती है और सरकार गिर जाती है, तो उस राज्य में चुनाव कराना पड़ेगा। ऐसे में सवाल यह है कि क्या उस राज्य को अगले लोकसभा चुनाव तक इंतजार करना होगा? या बीच में ही नए चुनाव कराए जाएंगे? या फिर राष्ट्रपति शासन के भरोसे छोड दिया जायेगा। दोस्तो आपको ज्ञात होगा कि राष्ट्रपति शासन लगने से राज्य की विधायिका का कोई काम नही रह जाता जिससे आम जनता की आवश्यकताओं ‚ विकास परियोजनाओं ‚ रोजगार सृजन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर विराम लग जाता है।

आगे की राह

एक राष्ट्र, एक चुनाव का विचार नया नहीं है। आजादी के बाद से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते थे। लेकिन विभिन्न राज्यों की सरकारों के गिरने और अलग-अलग समय पर चुनाव होने के कारण यह परंपरा खत्म हो गई। अब इस प्रस्ताव को फिर से लागू करने के लिए व्यापक कानूनी और संवैधानिक बदलावों की आवश्यकता होगी।

सरकार के लिए यह प्रस्ताव लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए संसद में विशेष बहुमत के साथ-साथ राज्यों की विधानसभाओं में भी मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद ही यह कानून बन पाएगा।

निष्कर्ष

दोस्तों "एक राष्ट्र, एक चुनाव" का उद्देश्य है कि देश में चुनावी खर्च और प्रशासनिक बोझ को कम किया जाए, जिससे सरकारें और प्रशासनिक मशीनरी बिना किसी रुकावट के विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकें। हालांकि, इसे लागू करने में संवैधानिक और राजनीतिक चुनौतियाँ सामने हैं। एवं इसे लंबे समय तक जारी रखना भी एक चुनौताी है फिर भी, अगर यह प्रस्ताव सफलतापूर्वक लागू होता है, तो यह देश के चुनावी ढांचे में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। 

Comments

Popular posts from this blog

मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस स्मृति दिवस पर की गयी घोषणा‚ 21 अक्टूबर 2023/ योगी जी द्वारा पुलिस के लिये की गयी घोषणा

Fire-Boltt Cyclone Pro., smart watch, Fire - bolt, news launches smart watch Rs -1199.00